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परमाणु समझौता /भारत में 6 परमाणु संयंत्र लगाएगा अमेरिका, 9 दौर की बातचीत के बाद हुआ फैसला

विदेश सचिव गोखले और अमेरिका की मंत्री एंड्रिया ने बैठक के बाद संयुक्त बयान जारी किया
दोनों देशों ने कहा- असैन्य परमाणु साझेदारी और द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते को करेंगे मजबूत
वॉशिंगटन. भारत में छह परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए अमेरिका सहमत हो गया है। भारत-अमेरिका रणनीतिक सुरक्षा समझौते के तहत नौवें दौर की बातचीत के बाद दोनों देशों ने संयुक्त बयान जारी किया है। भारत की तरफ से विदेश सचिव विजय गोखले और अमेरिकी मंत्री एंड्रिया थाम्पसन ने वार्ता में हिस्सा लियाा। एंड्रिया अमेरिका के हथियार नियंत्रण कार्यक्रम के साथ अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मामलों की मंत्री हैं।

संयंत्र स्थापित होने के बाद सरप्लस ऊर्जा मिलेगी
सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी सहयोग से छह परमाणु संयंत्र स्थपित होने के बाद भारत को सरप्लस ऊर्जा मिलने लगेगी। यह भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करेगी।

भारत ने ऊर्जा संबंधी जरूरतों को देखते हुए 2032 तक 63 हजार मेगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन को अपना लक्ष्य बनाया है। भारत के पास फिलहाल अभी 7 परमाणु ऊर्जा संयंत्र हैं। इनकी कुल क्षमता 6780 मेगावाट बिजली के उत्पादन की है। 2017 के दौरान देश की कुल बिजली आपूर्ति में परमाणु ऊर्जा का हिस्सा 3.22 फीसदी था।

अमेरिका के साथ हुए परमाणु समझौते से भारत को एनएसजी (न्यूक्लियर सप्लायर्स) ग्रुप में प्रवेश मिलने की संभावनााएं बढ़ गई हैं। इसके जरिए भारत कई देशों के साथ समझौता कर सकता है। बुधवार को जारी संयुक्त वक्तव्य में अमेरिका ने फिर दोहराया कि 48 सदस्यीय एनएसजी ग्रुप में भारत को शामिल करने के लिए वह पुरजोर कोशिश करेगा।

2006 में हुआ भारत-अमेरिका परमाणु समझौता
18 जुलाई 2006 को भारत और अमेरिका के बीच परमाणु समझौता हुआ था। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

2006 में जब बुश भारत की यात्रा पर आए तो सैनिक और असैनिक परमाणु रिएक्टरों को अलग करने पर भी सहमति बनी थी। इसके बाद अमरीकी संसद ने हेनरी हाइड एक्ट पारित किया लेकिन करार को अमली जामा पहनाने से संबंधित 1-2-3 समझौते पर काफी अर्से तक सहमति नहीं बन पाई। 18 जुलाई 2006 को इसे अंतिम रूप दिया गया था।

दो बड़े मुद्दे थे जिन पर दोनों देशों में सहमति नहीं बन पाई थी। भारत की मांग थी कि भविष्य में अगर वह परमाणु परीक्षण करता है, तो उसका इस समझौते पर कोई असर न पड़े। इसके लिए अमेरिकी कानून में बदलाव की जरूरत पड़ती और अमेरिका इसके लिए तैयार नहीं था। इसके अलावा भारत परमाणु संयत्रों में इस्तेमाल हुए ईंधन पर पूरा हक चाहता था।

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